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Language: Hindi & English
सनातन हिंदू धर्म में ब्रह्मविद्या अथवा अध्यात्मविद्या पर विचार करते समय सगुण और निर्गुण की अवधारणा सामने आती है। निर्गुण, निराकार परम तत्व की कल्पना करना अत्यंत कठिन है। सगुण के आधार पर ही ईश्वर तथा देवी-देवताओं की कल्पना विकसित हुई और उसी से उपासना-पद्धति, नवविधा भक्ति तथा भक्तिशास्त्र का विकास हुआ। इसी प्रक्रिया से मूर्तिशास्त्र, मंदिरशास्त्र और मंदिर स्थापत्यकला का उद्भव हुआ। संपूर्ण भारत में पाए जाने वाले असंख्य मंदिर, उनमें की गई शिल्पकला, शिलालेख तथा नक्काशी यह सिद्ध करते हैं कि मंदिर केवल देवताओं के निवासस्थान नहीं थे, बल्कि भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को संरक्षित करने वाले केंद्र थे। हजारों वर्षों तक विभिन्न राजाओं और राजवंशों ने धर्मसंवर्धन के लिए मंदिरों का निर्माण कराया। अनेक शास्त्रों में मंदिरों के महत्व का वर्णन करते हुए शांति, यश, समृद्धि, अन्न, संतति और मोक्ष जैसे लाभों का उल्लेख मिलता है। सगुण और निर्गुण — दोनों प्रकार की उपासना महत्त्वपूर्ण मानी गई हैं, तथा यह प्रतिपादित किया गया है कि सगुण से निर्गुण की ओर यात्रा होती है। सगुण उपासना और पूजा करते-करते अंततः निर्गुण की प्राप्ति होती है। इसलिए सगुण रूप में प्रतिमा और मूर्ति के माध्यम से पूजा की जाती है। सगुण उपासना के लिए मूर्तिपूजा की परंपरा विकसित हुई। मूर्ति किसकी? — देवता की, ईश्वर की। फिर प्रश्न उठता है कि वह देवता कैसा दिखता है, उसके गुण क्या हैं, उसका स्वरूप कैसा है। इन्हीं विचारों से प्रतिमा की कल्पना हुई, फिर मूर्तियों का निर्माण हुआ, देवी-देवताओं की अवधारणाएँ विकसित हुईं, उनसे जुड़ी कथाएँ, लीलाएँ और साहित्य रचा गया, और इसी समग्र प्रक्रिया से मूर्तिशास्त्र का विकास हुआ। वेदों के ज्ञान को सामान्य जनों के लिए सरल बनाने हेतु पुराणों की रचना की गई। उनमें असंख्य कथाएँ और आख्यानों का समावेश हुआ। उन कथाओं का दृश्य रूप मंदिरों की शिल्पकला, नक्काशी, विभिन्न मूर्तियों तथा मूर्तियों के मुखमुद्राओं और हावभावों में दिखाई देता है। इन सबके माध्यम से दर्शक को कोई संदेश देना, अनुभूति कराना और जीवनदृष्टि प्रदान करना उद्देश्य था। इसी विचारधारा से मूर्तिशास्त्र का विकास हुआ। प्रत्येक मूर्ति अत्यंत सूक्ष्म विचार के साथ निर्मित की जाती थी — कौन-सी मूर्ति है, उसका स्वरूप कैसा हो, उससे क्या अभिव्यक्त करना है, उसके लिए कौन-सा पत्थर उपयुक्त होगा, मूर्ति की स्थापना कहाँ होनी चाहिए, मंदिर का परिसर कितना विशाल हो — इन सभी सूक्ष्म बातों का विचार करके मूर्तिशास्त्र विकसित किया गया। दर्शकों को अद्भुत आनंद, आध्यात्मिक अनुभूति तथा इतिहास और पौराणिक विरासत से जोड़ने वाले हजारों-लाखों मंदिर निर्मित हुए। प्रतिमा और मूर्तिपूजन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इस कैप्सूल कोर्स में हम मूर्तिशास्त्र का अध्ययन करेंगे। आज हम मंदिर स्थापत्यकला और शिल्पकला के पीछे के विज्ञान और अर्थ को समझ नहीं पाते, क्योंकि उसका अध्ययन नहीं करते। वर्तमान में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान बनकर रह गए हैं और अधिकांश लोगों को मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों तथा प्रतीकों के सांकेतिक अर्थों की जानकारी नहीं होती। हिंदू मंदिर की प्रत्येक रचना और प्रत्येक मूर्ति एक विशिष्ट उद्देश्य से निर्मित की गई थी। उन शिल्पों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए सांकेतिक संदेश दिए गए थे, किंतु आज वे संदेश लुप्त होते जा रहे हैं। जो मंदिर कला और स्थापत्य के माध्यम से मनुष्य को आध्यात्मिक, भौतिक और दैवी उन्नति प्रदान करते थे, वे आज अज्ञान के कारण केवल स्थापत्य संरचनाएँ बनकर रह गए हैं। इस कैप्सूल कोर्स में मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई कलात्मक अभिव्यक्तियों का गहन परिचय कराया जाएगा। मूर्तिशास्त्र भारत की प्राचीन और गौरवशाली धरोहर है। प्रत्येक भारतीय के लिए इसके विषय में जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।
✅ मूर्तिशास्त्र – परिभाषा और संकल्पना
✅ मूर्तिशास्त्र का उद्गम और विकास
✅ सगुण और निर्गुण की अवधारणा
✅ देवी-देवता, उपासना पद्धतियाँ और मूर्तिशास्त्र का विकास
✅ मूर्तिशास्त्र के प्रकार
✅ प्राचीन मूर्तिशास्त्र संबंधी ग्रंथ और साहित्य
✅ मूर्तिशास्त्र अध्ययन की पद्धति, तंत्र और मंत्र
✅ प्रतिमा और प्रतीक
✅ हिंदू मूर्तिशास्त्र
✅ जैन और बौद्ध मूर्तिशास्त्र
✅ आधुनिक समय में मूर्तिशास्त्र की उपयोगिता
मार्गदर्शक
Ancestarol Sthapati Gurukulam, Expert selected for Ramjanmabhoomi Mandir