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Language: Hindi & English
भारत प्राचीन काल से ज्ञानाधिष्ठित समाज है। विभिन्न प्रकार का आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की व्यवस्था भारत के गुरुकुलों, आचार्यकुलों और विशेष प्रशिक्षण केंद्रों में उपलब्ध थी। गत तीन सौ वर्षों में पाश्चात्य जगत में विज्ञान की चकाचौंध भरी प्रगति देखते हुए हमारे मन में यह संदेह उत्पन्न होता है कि हमारे देश में विज्ञान-तकनीक संबंधी ज्ञान उपलब्ध था या नहीं। उससे उत्पन्न होता है एक व्यापक भ्रम और हीन भावना — कि उन्नत ज्ञान केवल पाश्चात्यों के पास है, भारत के पास केवल कर्मकांड, धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान ही है। हमारे प्राचीन ग्रंथों और गुरुकुलों में दिए जाने वाले शिक्षण का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में एक अत्यंत विशाल विज्ञान परंपरा विद्यमान थी। अनेक विज्ञान और तकनीक संबंधी विषय यहाँ पढ़ाए जाते थे। उससे बड़े पैमाने पर समृद्धि निर्मित हुई थी। विज्ञान संबंधी विभिन्न प्रकार के विशेष ग्रंथों की रचना हुई थी। उदाहरण देना हो तो अभियांत्रिकी और वास्तु निर्माण के विषय में समग्र ज्ञान प्रदान करने वाला समरांगण सूत्रधार ग्रंथ राजा भोज ने लिखा था। आयुर्वेद, स्वास्थ्य, स्थापत्यवेद, निर्माण और वास्तुविद्या, वैदिक सूक्त, गणित, ज्यामिति, बीजगणित — ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। कुछ ऋषि और उनके आश्रम विशेष प्रकार की विद्या के लिए प्रसिद्ध थे। जैसे — धौम्य और शौनक ऋषि के आश्रम में कृषि संबंधी गहन ज्ञान दिया जाता था। वसिष्ठ और जमदग्नि के आश्रम में धर्मविद्या सिखाई जाती थी। मार्कंडेय के आश्रम में धनुर्विद्या सिखाई जाती थी। भारद्वाज आश्रम में यंत्रविद्या और विमान विद्या का विशेष शिक्षण दिया जाता था। चरक, सुश्रुत औषधि विद्या सिखाते थे। भरतमुनि के आश्रम में नृत्य, गायन, वादन आदि। गौतम के आश्रम में सृष्टि नियमन विद्या। कणाद ऋषि के आश्रम में अणु-परमाणु सिद्धांत, तरंगवाद आदि का गहन ज्ञान दिया जाता था। नारद आश्रम में भजन, कीर्तन आदि। कपिल मुनि अध्यात्म विद्या सिखाते थे। पतंजलि मुनि योगसाधना सिखाते थे। भार्गव के आश्रम में युद्धकला सिखाई जाती थी। शांडिली और कौंडिल्य ऋषि व्यापार और उद्यम की शिक्षा देते थे। शाकुनेय आश्रम में विभिन्न पक्षियों और प्राणियों के विषय में ज्ञान। वात्स्यायन के आश्रम में कामशास्त्र का ज्ञान दिया जाता था। कौशिक और मारीच के आश्रम में नौका और समुद्र विद्या सिखाई जाती थी। प्राचीन भारत में कम से कम 50 से अधिक विषय विज्ञान और तकनीक से संबंधित थे। शून्य की खोज भारत में हुई — यह सभी जानते हैं। दशमलव पद्धति, अंकगणित, खगोलविज्ञान आदि अनेक वैज्ञानिक विषयों पर भारत में शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध थी। उनमें से कुछ विषय इस प्रकार हैं — पंच महाभूत विद्या, अग्नि विद्या, वायु विद्या, जल विद्या, अंतरिक्ष विद्या, पृथ्वी विद्या, सूर्य विद्या, चंद्र व लोक विद्या, मेघ विद्या, पदार्थ विद्युत विद्या, सौर ऊर्जा विद्या, सृष्टि विद्या, खगोल विद्या, भूगोल विद्या, काल मापन विद्या, भूगर्भ विद्या, रत्न व धातु विद्या, प्रकाश विद्या, विमान विद्या, जलयान विद्या, अग्नेय अस्त्र विद्या, जीव-जंतु विज्ञान विद्या, कृषि, पशुपालन, पक्षीपालन, यान यंत्रकार, रथकार, रत्नकार, स्वर्णकार, वस्त्रकार, कुंभकार, लोहकार, वास्तु विद्या, रंग विद्या, पाक विद्या, सूचिकार, उद्यान पाल, वन पाल, नापित विद्या, वाणिज्य विद्या आदि। इस प्रकार प्राचीन भारत में विज्ञान और तकनीक संबंधी शिक्षा और प्रशिक्षण व्यवस्था उपलब्ध थी। उसका उपयोग और विस्तार सीमित मात्रा में किया जाता था। प्रायः मानवीय, प्राकृतिक या पशु ऊर्जा का उपयोग वैज्ञानिक और तकनीकी कार्यों के लिए किया जाता था। इस कैप्सूल कोर्स के माध्यम से हम भारत में प्राचीन काल से विद्यमान विज्ञान और तकनीक परंपराओं की जानकारी लेंगे।
✅ विज्ञान और तकनीक विषयक भारतीय धारणा
✅ विज्ञान विषयक ग्रंथ और साहित्य
✅ वैज्ञानिक ऋषि परंपरा
✅ गणित और खगोलशास्त्र
✅ आयुर्वेद चिकित्सा और शल्यविद्या
✅ कालगणना और पंचांग
✅ कृषि और पशुपालन
✅ विमान विद्या और जलयान विद्या
✅ स्थापत्य और अभियांत्रिकी विद्या
✅ भूगर्भ विद्या, रत्नधातु विद्या
✅ धनुर्विद्या और अस्त्र-शस्त्र विद्या
✅ अन्य विज्ञान विषयक विद्या
मार्गदर्शक
Head, Research Department, Bhishma Santan Vedic Hindu University, USA