प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति
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Language: Hindi & English

सनातन वैदिक हिंदू अर्थात् भारतीय संस्कृति और सभ्यता संपूर्ण विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। ग्रीक, यूरोपीय, मेसोपोटामियाई, बेबिलोनियाई, माया, इंका, मिस्री आदि अनेक सभ्यताएं उत्पन्न हुईं, विकसित हुईं और काल के प्रवाह में नष्ट हो गईं। परंतु सनातन भारतीय संस्कृति आज भी टिकी है, जीवित है। इसका कारण प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में छिपा है। संपूर्ण जगत की सबसे विकसित और सबसे सुसंस्कृत सभ्यता भारतीय सभ्यता थी। यहाँ घर-घर से सोने का धुआं उठता था। सभी को सभी प्रकार की प्रगति करने का अवसर प्राप्त होता था। गत हजार वर्षों में आक्रमणकारियों ने इस संस्कृति का विध्वंस किया हो तो भी प्राचीन काल से भारत अत्यंत प्रगत था। इसीलिए चाहे कोलंबस हो या वास्को-डि-गामा, भारत खोजने के लिए ही उन्होंने अपना देश छोड़ा था। प्राचीन शिक्षा पद्धति की रचना ऐसी थी कि प्रत्येक व्यक्ति को यहाँ सर्वांगीण प्रगति करने का अवसर उपलब्ध था। कितने भी बाह्य आक्रमण हों, शिक्षा व्यवस्था टिकी रहती थी। शासन बदला, राजा बदला, फिर भी समाज जीवन चलता रहा। इसी बात को पहचानकर अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति को नष्ट करने का निर्णय किया। मैकॉले ने 1835 में भारत के संबंध में जो रिपोर्ट तैयार की, उसमें उन्होंने यह दर्ज किया कि भारत में एक भी भिखारी नहीं है, यहाँ कितना भी प्रलोभन दिखाओ या भय दिखाओ, कोई झूठ नहीं बोलता, चोरी नहीं करता, दूसरे की संपत्ति हड़पने का प्रयास नहीं करता। उस काल में भारत में तीन लाख से अधिक गुरुकुल थे। उनमें सभी जातियों और वर्गों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते थे। स्त्रियों के लिए विशेष शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध थी। इस संदर्भ में अंग्रेज अधिकारियों के पत्राचार और ईस्ट इंडिया कंपनी को भेजी गई रिपोर्टों का अध्ययन करके धर्मपाल ने दस खंड प्रकाशित किए हैं। उनमें यह विस्तृत वर्णन है कि अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था कैसे नष्ट की, हमारी मातृभाषा और हमारी संस्कृति से हमें कैसे काटा। उस काल में शिक्षा एक सर्वांगीण व्यवस्था थी। जन्म से मृत्यु तक निरंतर सीखने की यात्रा थी। उसमें कुटुंब शिक्षा, गुरुकुल शिक्षा, आचार्यकुल शिक्षा, विशेष शिक्षा, कला-कारीगरी शिक्षा, मंदिर शिक्षा, समाज शिक्षा, संस्कृति शिक्षा, धार्मिक शिक्षा, संस्कार शिक्षा — ऐसे शिक्षा के बहुविध आयाम थे। जो जो सीखना चाहे, उसे उसकी क्षमता और अधिकार के अनुसार सब कुछ सीखने का अवसर मिलता था। 14 विद्याओं और 64 कलाओं से आगे जाकर परा विद्या, अपरा विद्या का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता था। इसलिए प्राचीन काल से भारत एक ज्ञानाधिष्ठित समाज था। उससे एक तेजस्वी, सर्वगुण संपन्न, कार्यकुशल, परिश्रमी, सहिष्णु, ब्रह्मतेज और क्षात्रतेज से युक्त समाज निर्मित होता था। चार पुरुषार्थ और चार आश्रमों के माध्यम से जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य निःश्रेयस अभ्युदय प्राप्त किया जा सकता था। आज की पाश्चात्यों द्वारा हम पर थोपी गई शिक्षा पद्धति केवल लाचार, गुलाम, नौकर पैदा कर रही है। दूसरा विकल्प न होने से समाज असहाय बन गया है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति को पुनः प्रारंभ करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। इस कैप्सूल कोर्स में हम प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का विस्तृत परिचय करेंगे।


कैप्सूल कोर्स के विषय

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का परिचय और इतिहास
✅ प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के मूलतत्त्व
✅ प्राचीन शिक्षा पद्धति के प्रकार
✅ प्राचीन शिक्षा में विषय, विद्या, विज्ञान, कौशल
✅ गुरुकुल शिक्षा
✅ आचार्यकुल शिक्षा और विशेष शिक्षा
✅ मंदिर शिक्षा और संस्कृति शिक्षा
✅ कुटुंब शिक्षा और समाज शिक्षा और संस्कार शिक्षा
✅ परा विद्या और अपरा विद्या
✅ धार्मिक / व्यावसायिक / आध्यात्मिक / कौशलाधारित
✅शिक्षा प्राचीन शिक्षा पद्धति की विशेषताएं
✅ आज के युग में प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति की उपयोगिता

मार्गदर्शक

प्रा. क्षितीज पाटुकले

Author, Academician, Expert in Indian Knowledge System, Sanatan Vedic Hindu Dharma, Heritage & Cultural Expert, Entrepreneur & Digital Media Producer, etc

संस्थापक : भीष्म स्कूल ऑफ इंडियन नॉलेज सिस्टीम एवं भीष्म सनातन वैदिक हिंदू युनिव्हर्सिटी, अमेरिका

विशेषज्ञ मार्गदर्शक

मार्गदर्शन एवं प्रश्नोत्तर सत्र

रिकॉर्डिंग उपलब्ध

ऑनलाइन वर्ग – ZOOM के माध्यम से

13 से 17 जुलाई, 2026

शाम 08:00 से 09:15 बजे